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पद्म श्री रत्नप्पा का देश को आजादी दिलाने में रही अहम भूमिका : कल वाराणसी में मनायी जाएगी जयंती

वाराणसी : बीसवीं सदी में जिन महापुरुषों ने कुम्हांर समाज में जन्म लेकर समाज को गौरवान्वित किया और देश का मान बढ़ाया उसमें पद्म श्री डा.रत्नप्पा का महत्वपूर्ण स्थान है।
इनका जन्म १५ सितंबर सन् १९०९ में महाराष्ट्र और कर्नाटक की सीमा के नजदीक स्थित कोल्हापुर जनपद के नामसीर गांव में हुआ था।
बचपन से ही इनके अंदर चंचलता और अन्याय के खिलाफ लड़ने की उत्सुकता थी। इन्होंने प्राथमिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय तथा बीए की परीक्षा राजाराम कालेज नागपुर से उत्तीर्ण की।
पढ़ाई के वक्त से ही वे राजे रजवाड़ों के बिरोधी थे।देश की आजादी का जज्बा उनके अंदर बचपन से ही था। युवा वस्था में उन्होंने प्रजापरिषद की स्थापना की तथा समाज में फैली कुरीतियों, बुराइयों, अंधविश्वासों, ढोंग पाखण्ड, आर्थिक सामाजिक विषमता तथा जमींदारों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई। सामाजिक समस्याओं के साथ इन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया जिससे रत्नप्पा जी ब्रिटिश हुकूमत की नजर पर चढ़ गये।आठ जुलाई १९३९ को उन्होंने प्रजापरिषद के बैनरतले मुम्बई में एक ऐतिहासिक जुलूस निकाला।इनकी बढ़ती क्रांतिकारी ताकत से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया। कोल्हापुर के राजा ने इनके ऊपर जुर्माना लगाया।
पूना विश्व विद्यालय ने इन्हें डाक्टर की मानद उपाधि से विभूषित किया। रत्नप्पा ,कांग्रेस के सदस्य हो गये और कांग्रेस के साथ रहकर देश की आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे १९४२ के अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में इन्होंने हिस्सा लिया ।देश की आजादी के बाद देश के संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य बनाये गये ।
ये पिछड़े समाज के प्रतिनिधि के रूप में एक मात्र सदस्य थे। इन्होंने डाक्टर भीमराव अम्बेडकर का काफी सहयोग किया। भारतीय संविधान के फाइनल ड्राफ्ट पर अम्बेडकर के साथ रत्नप्पा ने भी हस्ताक्षर किया था। १९५२ के प्रथम लोकसभा चुनाव में ये महाराष्ट्र से सांसद चुने गए। इसके बाद सियोल विधानसभा क्षेत्र से कयी बार विधायक चुने गए। समाज के प्रति निष्ठा और इनके संघर्षो को देखते हुए इन्हें महाराष्ट्र सरकार में गृह राज्य मंत्री बनाया गया। इसी दौर में इन्हें महाराष्ट्र राज्य के चीनी मिलों का चेयरमैन बनाया गया। इनके कार्यों को देखते हुए सरकार ने इन्हें पद्म श्री सम्मान से विभूषित किया।ये ग़रीबों,पिछड़े वर्ग और शोषित वर्ग के हकों के लिए जीवन पर्यन्त संघर्ष करते रहे । इन्हें महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन के जनक के रूप में जाना जाता है ।
शिक्षा के क्षेत्र में इन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और स्कूल कालेजों की स्थापना की। महाराष्ट्र में कयी शिक्षण संस्थाएं इनके नाम पर खुली है। विधायक और मंत्री रहते हुए इन्होंने अपने समाज के लोगों की ब्यक्तिगत और सामूहिक मदद की जिससे आज भी रत्नप्पा महाराष्ट्र के लोगों के दिलों में बसे हैं । कुम्हांर समाज के दर्जनों लोगों को उन्होंने एम बी बी एस में प्रवेश दिलाकर उन्हें चिकित्सक बनाने का काम किया। एक बार महाराष्ट्र में अखिल भारतीय प्रजापति कुम्भकार महासंघ का अधिवेशन मुम्बई में हुआ । महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष आर बी के प्रजापति के निवेदन पर उन्होंने अधिवेशन में हिस्सा लिया और समुदाय के संगठन तथा लोगों की निष्ठा को देखकर वे बहुत प्रभावित हुए ।गृहराज्य मंत्री रहते हुए उन्होंने मुम्बई में कुम्हांर कालोनी बनाने, मिट्टी उद्योग के संवर्धन के लिए नौ एकड़ जमीन एलाट कराया किन्तु आपसी खींचतान के चलते उसका उद्देश्य खटाई में पड़ गया ।
इनकी स्मरण शक्ति इतनी अच्छी थी कि एक बार जिससे बात कर लेते वह ब्यक्ति उनके दृष्टिपटल पर हमेशा विद्यमान रहता था महाराष्ट्र में उनकी छवि एक चरित्र वान, संघर्षशील गांधीवादी नेता थे रूप में है। १९६४ में जब महाराष्ट्र में भाषा विवाद शुरू हुआ तो उन्हें बहुत ही कष्ट हुआ क्योंकि इनका दृष्टिकोण ब्यापक था।ये पूरी मानवता को एक नजर से देखते थे।ये हमेशा जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के संकुचित सोच से ऊपर उठकर सोचते थे।वे वसुधैव कुटुंबकम् की संस्कृति से प्रभावित थे तथा जिओऔर जीने दो की सोच रखते थे । रत्नप्पा जी भाषा और क्षेत्रीय मानसिक सोच को देश की एकता और अखंडता के लिए घातक समझते थे ।वे हिन्दू मुस्लिम एकता के गांधी की सोच के कायल थे । यही कारण था कि महाराष्ट्र में कयी मुद्दो पर भड़के साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में सफल रहे ।वे कमजोर वर्ग के लोगों को विशेष सुविधाएं देकर उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ना चाहते थे । रत्नप्पा जी पर लोहिया के विचारों का भी असर था ।
२३ दिसंबर १९९८ को इस महामानव का देहावसान हो गया। और राजकीय सम्मान के साथ इनका अंतिम संस्कार किया गया ।
ऐसे महापुरुष का हम शत शत नमन करते हैं।

पदम श्री डॉक्टर रत्नप्पा कुम्भार की जयंती पर १५ सितंबर २०२१ को मुनारी के मैदान वाराणसी में अत्यंत भव्य जयंती कार्यक्रम का आयोजन किया गया है।

जयप्रकाश वर्मा
प्रभारी दैनिक महराजगंज न्यूज

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