गुजरात

नवरात्रि के लिए डिजाइनर मटकी (गरबा) तैयार सजने लगे बाजार

सूरत । गुजरात में नवरात्रि आज भी एक पारंपरिक तरीकों के साथ मनाई जाती है । नौ दिन माँ अम्बा भवानी की आराधना के साथ – साथ लोग गरबा भी खेलते है । इस वर्ष कोरोना महामारी की वजह से शायद बड़े आयोजन नहीं होंगे मगर घर पर मां अम्बा की आराधना की छुट मिलने की उम्मीद है । घरों में या घरो के बाहर आंगन में मिट्टी की मटकी ( गरबा ) जिसमें छोटे छोटे छेद होते है और अंदर अखंड दिए के साथ माताजी की घट स्थापना की जाती है । स्वदेशी मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करनेवाले विनोद प्रजापति बताते है कि दीपावली से पहले नवरात्रि में कुम्हारों द्वारा बनाए हुए मिट्टी के फैन्सी मटकी ( गरबा ) की बहुत मांग रहती है । गुजराती समाज के साथ मारवाड़ी समाज की महिलाए मिट्टी का गरबा ले जाती है ।
लेकिन इस वर्ष गरबा की पहले जैसी डिमांड नही रही है । हर साल गरबा पहले से बुकिंग करते थे लेकिन अबकी बार कोरोना संक्रमण की वजह से नाम मात्र ही गरबा बुकिंग हो रही है । मिट्टी के गरबा का बहुत महत्व है।
गरबा शाब्दिक अर्थ गर्भ दीप है । नवरात्रि के पहले दिन छिद्रों से लैस एक मिट्टी के घड़े को स्थापित किया जाता है जिसके अंदर दीपक प्रज्वलित किया जाता है और साथ ही चांदी का एक सिक्का रखा जाता है । इस दीपक को दीपगर्भ कहा जाता है। दीप गर्भ के स्थापित होने के बाद महिलाएं और युवक ,युवतियां | रंग – बिरंगे कपड़े पहनकर मां शक्ति स्वरूप दुर्गा जी के समक्ष नृत्य कर उन्हे प्रसन्न करती है । गर्भदीप स्त्री की सृजनशक्ति का प्रतीक है और गरबा इसी दीप गर्भ का अपभ्रंश रूप है । गरबा नृत्य में महिलाएं ताली . चुटकी , डांडिया और मंजीरों का प्रयोग भी करती है । ताल देने के लिए महिलाएं दो या फिर चार के समूह में विभिन्न प्रकार से ताल देती है । इस दौरान देवी शक्ति और कृष्ण की रासलीला से संबंधित गीत गाए जाते हैं।

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